प्रेम

कभी किसी फल को
 पकते देखा है?
कैसे खींचता है वो
  प्राण
अपनी
 जड़ों से

 हवा से
मौसम से
लेता है
 रंग रूप

और कैसे
 भरता है उसमे
रस

वक़्त लगता है न
फल को फल
 बनने में
धीरे धीरे
 मद्धम मद्धम
पकने में

प्रेम भी
ऐसे ही
पकता है। "
                     पूजा 


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