उत्तर प्रदेश की चुनावी खिचड़ी


बुआ और बबुआ का चुनावी कनेक्शन 

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किस्सा कुर्सी का .....जी हाँ यह सारा किस्सा कुर्सी का ही है, जिसके लिए दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैऔर जिन बुआ- बबुआ की बात हम कर रहे है , वो यूपी की राजनीति के दो प्रमुख चेहरे मायावती और अखिलेश है | बुआ और बबुआ का प्यार देख कर कौन कहेगा कि कभी मायावती ने सपा से कभी हाथ न मिलाने की घोषणा की थी | खैर वो भी एक दौर था जब मुलायम सिंह सपा के सुप्रीमो हुआ करते थे | तब 1995 में मायावती के ऊपर गेस्ट हाउस कांड हुआ था, मायावती ने इसके लिए मुलायम सिंह पर आरोप लगाया था और कभी एक दूसरे का मुँह न देखने की बात कही थी | समय बदल चुका है और मौके का दस्तूर समझना भी जरूरी है कि दुश्मन भी दोस्त समय की जरूरत है | वो कहते है न दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है और राजनीति में कब दुश्मन दोस्त और दोस्त दुश्मन हो जाए कहा नहीं जा सकता |


पुरानी बातो पर मिट्टी डालते  हुए, बुआ जी ने पुराने सभी गिलेसिकवे भुलाकर अपने भतीजे को गले लगा लिया | अब नया इतिहास रचा जाएगा, लोकसभा चुनाव नजदीक है और ऐसे में इस गठबंधन का इतिहास देखना भी जरूरी है | यह बात 25 साल पुरानी है, तब 1993 में भी बीएसपी-सपा के बीच ऐतिहासिक गठबंधन हुआ था, लेकिन तब यह गठबंधन  कांशीराम-मुलायाम के बीच हुआ था| उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा-सपा गठबंधन की जीत हुई, जिसके बाद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन आपसी मनमुटाव के कारण यह गठबंधन ज्यादा दिन न चल पाया और 2 जून 1995 को बसपा ने समर्थन वापसी की घोषणा कर दी | समर्थन वापसी से मुलायम सरकार अल्पमत में आ गयी और गुस्से में सपा कार्यकर्ता और विधायको ने मीरारोड़ स्थित गेस्ट हाउस पहुँचकर मायावती के साथ कमरा बंद करते मारपीट की और अभद्र व्यवहार किया था | इस हमले से मायावती को बहुत मुश्किल से बीजेपी  विधायक ने बचाया था | इस घटना के बाद मायावती ने ऐलान किया था कि वह कभी मुलायम सिंह से हाथ नहीं मिलाएगी| सुना था कि वक़्त सब घाव भर देता है, तभी मायावती ने मोदी से दुश्मनी में अपने साथ हुए गेस्ट हाउस कांड को भुलाकर अखिलेश से हाथ मिला लिया है | बुआ और बबुआ का यह प्यार क्या रंग लाएगा यह देखना दिलचस्प होने वाला है | साथ ही मायावती-अखिलेश के बीच हो रहे गठबंधन से अटकले लगाई जा रही है कि इस गठबंधन से लोकसभा चुनाव 2019 में यूपी में बीजेपी की लगभग 50 प्रतिशत सीट कम हो सकती है| इस गठबंधन से 25 साल पहले का इतिहास दोहराया जा सकता है |

 इस गठबंधन से बीजेपी भी चिंतित है, क्योकि पहले भी इसी गठबंधन से उत्तरप्रदेश विधान सभा चुनाव में बुरी तरह से हारी थी और लोकसभा चुनाव की जीत उत्तरप्रदेश की सीटो की जीत पर निर्भर करती है | उत्तरप्रदेश में  सबसे अधिक लोकसभा सीट लगभग 80 है, जिसमे पिछले लोकसभा चुनाव  में बीजेपी को 73 सीट मिली थी, जिसमे 2 सीट अपना दल की थी | चुनावी विगुल बज चुका है और हर पार्टी के पास बस यही मौका बचा है, जीतने का | सब वोटर को लुभाने में लगे , तो कोई पुरानी दुश्मनी को भूलकर दोस्त बन गए है | बुआ-बबुआ की जोड़ी भी यूपी इलेक्शन में साथ आने से बीजेपी की परेशानियाँ बढ़ गयी है |
* रीतिका 
                                                                                                 

                                                                                                                                                   

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