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उत्तर प्रदेश की चुनावी खिचड़ी

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बुआ और बबुआ का चुनावी कनेक्शन   P.C:Google किस्सा कुर्सी का .....जी हाँ यह सारा किस्सा कुर्सी का ही है, जिसके लिए दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैऔर जिन बुआ- बबुआ की बात हम कर रहे है , वो यूपी की राजनीति के दो प्रमुख चेहरे मायावती और अखिलेश है | बुआ और बबुआ का प्यार देख कर कौन कहेगा कि कभी मायावती ने सपा से कभी हाथ न मिलाने की घोषणा की थी | खैर वो भी एक दौर था जब मुलायम सिंह सपा के सुप्रीमो हुआ करते थे | तब 1995 में मायावती के ऊपर गेस्ट हाउस कांड हुआ था, मायावती ने इसके लिए मुलायम सिंह पर आरोप लगाया था और कभी एक दूसरे का मुँह न देखने की बात कही थी | समय बदल चुका है और मौके का दस्तूर समझना भी जरूरी है कि दुश्मन भी दोस्त समय की जरूरत है | वो कहते है न दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है और राजनीति में कब दुश्मन दोस्त और दोस्त दुश्मन हो जाए कहा नहीं जा सकता | पुरानी बातो पर मिट्टी डालते   हुए, बुआ जी ने पुराने सभी गिलेसिकवे भुलाकर अपने भतीजे को गले लगा लिया | अब नया इतिहास रचा जाएगा, लोकसभा चुनाव नजदीक है और ऐसे में इस गठबंधन का इतिहास देखना भी जरूरी है | यह बात 25 साल ...

समानता और गरिमापूर्ण जीवन जीना, सबका मौलिक अधिकार

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*रीतिका शुक्ला  सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 6 सितम्बर 2018 को एकमत से 158 साल पुरानी IPC की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया , जो सहमति से बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध की श्रेणी में रखता था|  इस धारा के इस हिस्से के हटने के बाद समलैंगिक समुदाय के लोग और जो उनके इस लड़ाई के दौरान समर्थक रहे है , उन्होंने इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत जोश के साथ किया | मै और मेरी ही तरह कई और समर्थक भी उनकी इस जीत के जश्न में शामिल हुए , लेकिन वहां पर आई मीडिया ने इस पूरी तस्वीर को ही बदल डाला | हमको समर्थक से समलैंगिक बना दिया गया, यह मुझे सुबह का अखबार देखकर पता चला | हम जिस क़ानून की बात कर रहे है वो अंग्रेजो के जमाने का है और तब यह अपराध माना जाता था | आजादी के बाद हमारा संविधान बना, जिसमे हम सभी भारतवासियों को मौलिक अधिकार प्राप्त हुए | इन अधिकारों में समानता का अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है | हर बार हम जब समानता की बात करते है तो बस स्त्री या पुरुष की समानता की बात होती है और हम सब समलैंगिक और सेक्स माइनॉरिटीज को भूल ज...

आह से वाह तक का सफर : अर्चना सतीश

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आँखों में आत्मविश्वास की चमक , होठों पर आत्मीयता भरी मुस्कान और वाणी में किसी के भी  मन को छू जाने वाले  ज्ञान और अनुभूतियों  का सहज प्रवाह।   ये पहचान है उनकी जिन्हे लगभग पूरा लखनऊ अर्चना सतीश के नाम से जाता है। प्रोफेशनली वो एक न्यूज़ रीडर हैं , एंकर हैं लेकिन उनकी पहचान इतनी ही नहीं इससे बहुत ज़्यादा है। वो एक प्रतिभाशाली एंकर और न्यूज़ रीडर होने के साथ साथ एक आध्यात्मिक व्यक्ति भी है।अपने आस पास के लोगों के लिए  वो प्रेम , करुणा और सकारात्मक ऊर्जा से भरी हुई उनकी दीदी हैं जिनकी प्रार्थनाओं में एक आध्यात्मिक बल है।  जिनसे लोग अपने सुख दुःख बांटने में बिलकुल नहीं हिचकिचाते। यश भारती सम्मान से सम्मानित अर्चना जी अपने आत्मबल से कैंसर जैसे रोग को भी मात दे चुकी हैं। दीदी , आमतौर पर लखनऊ में रहने वाले लोग और खासकर दूरदर्शन आकाशवाणी से जुड़े लोग आपको न्यूज़ रीडर और एंकर के रूप में ही जानते हैं। मैंने भी सबसे पहले आपको इसी रूप में जाना था।  यानी एक तरह से ये आपकी प्राथमिक पहचान है। तो सबसे पहले हम आपके इसी रूप की बात करते हैं। कैसे और कब ...

हर किसी के पास एक कहानी है : इरफ़ान

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गुफ्तगू ...  राज्य सभा टी वी पर प्रसारित होने वाला एक ख़ास प्रोग्राम  जो अपने फॉर्मेट के दूसरे शोज़ से बिलकुल अलग बिल्कुल अलहदा है।फिल्म और  समाज के विभिन्न क्षेत्रोँ में सक्रिय ,रचनात्मक लोगों के साक्षात्कार पर आधारित इस कार्यक्रम के होस्ट हैं सैय्यद मोहम्मद इरफ़ान। इरफ़ान जी की सिर्फ आवाज़ ही नहीं अंदाज़ भी बेहद  निराला है। इनकी सबसे ख़ास बात यह है कि ये  वो अपने गेस्ट पर बेवजह हावी नहीं होते बल्कि उन्हें  पूरी तरह से खुलने और उन्हें उनकी  कहानी उन्हीं की ज़ुबानी सुनाने का पूरा  मौका देते हैं। इरफ़ान सिर्फ एक अच्छे एंकर ही नहीं बल्कि  सामाजिक बदलावों और उसकी प्रवृतियों पर भी अपनी पैनी नज़र रखने वाले एक जागरूक नागरिक भी  हैं। गुफ्तगू और रेडियो की दुनिया के बेहद लोकप्रिय और  जाने माने एंकर से हमने भी कुछ गुफ्तगू की। इरफ़ान जी , हम अपने इंटरव्यू की शुरुआत भी वहीँ से करते हैं जहां से आमतौर पर आप भी शुरू करते हैं अपने प्रोग्राम गुफ्तगू में , तो सबसे पहले हमें ये बताइये कि आपकी पैदाइश कहाँ की है ? गुफ्तगू तक...

सबसे ख़तरनाक- पाश

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  जिसका विज़न, जिसका चिंतन  अपने देश काल का जितनी दूर तक अतिक्रमण कर सकने में सक्षम होता है वो कवि , वो विचारक उतनी ही सदियो तक लोगों के दिलों, उनकी स्मृतियों में  ज़िंदा रहता है।  पाश भी एक ऐसे ही कवि हैं। उनकी कवितायेँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि उस वक़्त रही होंगी जब लिखी गई होंगी। आज पाश के जन्मदिन पर उनकी एक कविता, जिसे खूब पढ़ा और गाया जाता  रहा है, लेकिन फिर भी जिसे अपने ब्लॉग के ज़रिये शेयर करने का मोह मैं नहीं छोड़ पाई।  इस कविता की एक एक पंक्ति मूलयवान और प्रासंगिक है। पढ़ें  मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है सबसे ख़तरनाक नहीं होता कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है जुगनुओं की लौ में पढ़ना मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है सबसे ख़तरनाक नहीं होता सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना तड़प का न ह...